Kanaiyalal Maneklal Munshi

 Kanaiyalal Maneklal Munshi कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी का नाम सुना है?मुंशी जी गुजरात से ताल्लुक रखते हैं। स्वतन्त्रता सेनानी रहे, गांधी और पटेल के अनन्य भक्त।पटेल के बारदौली और गांधी के दांडी और असहयोग, भारत छोड़ों आंदोलनों की पहली पंक्ति में शामिल। जेल यात्राएं भी की।

Kanaiyalal Maneklal Munshi

 Kanaiyalal Maneklal Munshi

आजादी के पहले की सरकारों में मंत्री रहे। धर्म के आधार पर राष्ट्र-विभाजन के खिलाफ खड़े हुए और कांग्रेस के लिए अहिंसा छोड़ गृह-युद्ध के विचार का समर्थन किया।

अहिंसा त्यागने का सैद्धान्तिक समर्थन इन्हें कांग्रेस से दूर ले गया, गांधी जी ने ही निकाला फिर कुछ ही समय में वापस भी बुला लिया।संविधान निर्माण के लिए बनाई गई विभिन्न समितियों में से सबसे अधिक 11 समितियों के सदस्य थे मुंशी जी.

प्रारूप समिति में ‘हर व्यक्ति को समान संरक्षण’ के सिद्धांत का मसविदा इन्होंने और श्री अम्बेडकर ने मिलकर तैयार किया था।गुजराती होते हुए भी हिंदी भाषा को राजभाषा का दर्जा दिलाने में इन्होंने ही सबसे प्रमुख भूमिका निभाई, जिसकी वजह से हम सब ‘हिंदी दिवस’ मनाते हैं।जुलाई में मनाया जाने वाला वन महोत्सव भी इन्हीं की देन है।

कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी

हैदराबाद राज्य (प्रिंसली स्टेट) के लिए ये भारत सरकार के प्रतिनिधि (एजेंट जनरल) थे। जब राजेन्द्र प्रसाद राष्ट्रपति बने तो उनकी जगह पर इन्हें ‘खाद्य एवं कृषि’ मंत्री बनाया गया। जूनागढ़ के भारत में विलय होने पर पटेल ने जनसभा को कहा था कि भारत सरकार सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण कराएगी।

जब पटेल और मुंशी जी मंदिर हेतु गांधी जी का आशीर्वाद लेने गए तो गांधी ने खुलकर समर्थन तो दिया पर मंदिर निर्माण में लगने वाले खर्च को सरकार के बजाय जनता से वहन करवाने के लिए कहा।

खैर, मंत्रिमंडल ने 47 में फैसला लिया, पर जनवरी 48 में गांधीजी और दिसम्बर 50 में पटेल के स्वर्गवासी होने के बाद नेहरू जी पर दबाव खत्म हो गया था।एक कैबिनेट मीटिंग में नेहरू ने कृषि मंत्री मुंशी जी को कह दिया कि आप मंदिर निर्माण पर जोर मत दीजिये, ये हिन्दू नव जागरणवाद है। मुंशी जी बिना बोले वापस आ गए और अगले दिन एक दमदार और मार्मिक चिठ्ठी लिखी जो उनकी लिखी किताब ‘पिलग्रमीज टू फ्रीडम’ में भी है।

इस चिठ्ठी को पढ़कर राज्यों के मामले में पटेल के अनन्य सहयोगी वी पी मेनन ने कहा था कि आपके इन शब्दों के लिए मैं जीवित और आवश्यकता पड़ने पर मरने को तैयार हूं।अगर क मा मुंशी जी न होते तो शायद सोमनाथ भी ‘अयोध्या’ होता। रूस की आयातित विचारधारा ‘सामूहिक खेती’ के विरोध में इन्होंने कांग्रेस छोड़ राजगोपालाचारी की ‘स्वतंत्र पार्टी’ फिर ‘भारतीय जनसंघ’ ज्वाइन कर ली थी। हालांकि फिर जल्द ही राजनीति से सन्यास ले लिया।

इन्होंने गांधी के साथ ‘यंग इंडिया’ और प्रेमचन्द के साथ ‘हंस’ का सहसम्पादन किया था, पर ये जाने जाते हैं ‘भारतीय विद्या भवन’ की स्थापना हेतु। इन्होंने गुजराती और इंग्लिश में 50 से अधिक किताबें लिखी।मेरा इनसे परिचय इनकी रचनाओं के माध्यम से हुआ। पहली रचना मैंने “कृष्णावतार” पढ़ी और मुझे इनसे मुहब्बत हो गई।

कृष्णावतार मूलतः गुजराती में हैं पर इसका हिंदी अनुवाद बड़े-बड़े हिंदी लेखकों से अधिक उत्तम है।कृष्णावतार 6 भागों में है और इन्हें पढ़कर आपको अलग-अलग भावनात्मक अनुभूति होती है।इनके अलावा परशुराम, लोपामुद्रा, लोमहर्षिणी, ‘गुजरात के नाथ’ सीरीज की 4 किताबों समेत सभी किताबें पठनीय हैं।

कहते हैं कि इनकी ‘जय सोमनाथ’ से स्पर्धा करने के लिए आचार्य चतुरसेन ने ‘सोमनाथ’ लिखी थी। दोनों ही किताबें पढ़िए और आप देखेंगे कि चतुरसेन जी कितने चतुर हैं। सुशोभित के कमेंट से जो जानकारी मिली, वह यह थी कि ‘मुंशी प्रेमचंद’ के मुंशी, कन्हैयालाल माणिकलाल हैं।

ऊपर जिक्र आया है कि मुंशी जी ने प्रेमचंद के साथ ‘हंस’ पत्रिका का सम्पादन किया। मुंशी जी प्रेमचंद से उम्र, अनुभव, नाम और साहित्य में बड़े थे। कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी जी का ‘मुंशी’ और प्रेमचंद का ‘प्रेमचंद’ मिलाकर बना मुंशी प्रेमचंद।

मुंशी प्रेमचंद किसी एक व्यक्ति का नाम नहीं, बल्कि गुजराती और हिंदी साहित्य के दो महानतम लोगों के नामों का अद्भुत मिश्रण है। हिंदी पट्टी का पाठक मुंशी जी से उतना परिचित नहीं।

कारण उनका राजनेता होना, फिर अंततः नेहरू का विरोधी हो जाना, अधिकांशतः पौराणिक और हिन्दू राजाओं, घटनाओं पर लिखना
(अंग्रेजी साहित्य छोड़कर) हो सकते हैं।

FAQ’s
  • कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी का जन्म कब हुआ था?

>30 दिसंबर 1887
कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी / जन्म तारीख

  • संविधान में केएम मुंशी की क्या भूमिका थी?

>मुंशी उस ध्वज समिति में थे जिसने अगस्त 1947 में भारत के ध्वज का चयन किया था, और उस समिति में भी थे जिसने बीआर अंबेडकर की अध्यक्षता में भारत के संविधान का मसौदा तैयार किया था। एक राजनेता और शिक्षक होने के अलावा, मुंशी एक पर्यावरणविद् भी थे।

  • डॉ केएम मुंशी ने कौन सा आंदोलन शुरू किया था?

1959 में, मुंशी नेहरू-प्रभुत्व वाली (समाजवादी) कांग्रेस पार्टी से अलग हो गए और अखंड हिंदुस्तान आंदोलन शुरू किया।.

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